सुप्रीम कोर्ट का सुझाव- सरकारी दस्तावेजों को सिर्फ हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित करने के कानून में बदलाव हो, सुदूर इलाके के लोगों को सुविधा होगी

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“भारत सरकार को राजभाषा अधिनियम (Official Languages Act) में बदलाव पर विचार करना चाहिए.“ केंद्र को अवमानना के एक मामले में राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी की है. 30 जून को दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को एक दस्तावेज 8वीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं में प्रकाशित करने को कहा था. ऐसा न होने पर अवमानना का नोटिस जारी किया था.

हाई कोर्ट के नोटिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची केंद्र सरकार ने की दलील दी कि कानूनन सिर्फ अंग्रेज़ी और हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है. इन्हीं दो भाषाओं में केंद्र सरकार को दस्तावेज प्रकाशित करने होते हैं. इस पर चीफ जस्टिस एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने टिप्पणी की, “आपको यह बात हाई कोर्ट को बतानी चाहिए थी.“

सुप्रीम कोर्ट ने थोड़ी देर की जिरह के बाद हाई कोर्ट की तरफ से जारी अवमानना नोटिस पर रोक लगा दी. सरकार से कहा कि वह हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ वहीं पुनर्विचार याचिका दाखिल करे. सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट ने कहा,”हाई कोर्ट का आदेश वहां रखी गई दलीलों के आधार पर आया था. इस आदेश के पीछे भावना सही है. आखिर कर्नाटक, महाराष्ट्र या नागालैंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों के लोग सरकार के किसी दस्तावेज को हिंदी या अंग्रेजी में कैसे समझ पाएंगे.“

केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने एक बार फिर ऑफिशियल लैंग्वेजेस एक्ट के प्रावधानों का हवाला दिया. इस पर कोर्ट ने कहा, “आज की तारीख में अनुवाद बहुत सरल काम है. सुप्रीम कोर्ट भी अपने फैसलों का कई भाषाओं में अनुवाद कर रहा है. सरकार को कानून में बदलाव करने पर विचार करना चाहिए.

संविधान की 8वीं अनुसूची के तहत 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है. यह भाषाएं हैं- असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, मैथिली, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलगु और उर्दू. कई और भाषाओं को इस अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव सरकार के पास लंबित है.

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